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गुम होती पहचान

Posted On: 19 Jul, 2015 Others,social issues,Hindi Sahitya में

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बड़ी मुश्किल स्थिति है।उम्र के साथ जहाँ आदमी के किरदार बदलते हैं,उसके एहसास बदलते हैं-वहाँउसकी पहचान भी हर स्तर पर बदलती जाती हैं।वह,परिवार में ,समाज में अपनी पहचान की विविधता के प्रति,बदलते हुए स्वरूप के प्रति जागरुक हो पाता भी नहीं कि उसका स्वरूप बदल जाता है।नित्य आईना देखते हुए भी व्यक्ति के स्वरूप का कसाव ,तनाव,अथवा संकुचन उसकी पहचान का साथ नहीं देता। आईना भी उसके मनोनुकूल स्वरूप को ठगता हुआ सा प्रतीत होता है। यह होती है शिशुपन से लेकर व्यक्ति के वार्धक्य तक की वह कहानी जो उसकेअन्तर्मन की व्यथा से जुड़कर समाज की गुम होती चेतना की कहानी भी बन जाती है।
एक शिशु, पुत्र अथवा पुत्री का स्वरूप ग्रहण कर, एक सम्पूर्ण परिवार के सम्बन्ध सूत्रों मे बँधकर, अकथ और अकल्पनीय प्यार पाता है ।परिवार तो परिवार,आस-पड़ोस,समाज में भी उसका शिशुपन आकर्षण का केन्द्र बन जाता है।परिवार की सारी व्यवस्थाएँ, गतिविधियाँ उसके इर्द गिर्द घूमती हैं।तरह तरह के उत्सवों से उसका स्वागत किया जाता है।कभी कभी अवाँछित स्थितियों मे सामाजिक अथवा पारिवारिक मानदंडों पर तिरस्कार का पात्र होने पर भी उसका स्वरूप सामान्यतः मन को मुग्ध करनेवाला ही होता है।कभी कभी अवांछित समझ कर उसे त्याग देने की स्थिति में समाज की आँखें त्यागनेवाले पर तनती अवश्य हैं।उसका तिरस्कार पूरी सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न अवश्य खड़ा करता है।पर यह एक पृथक प्रश्न है।

शिशु अपनी शारीरिक वृद्धि के साथ- साथ माता पिताऔर परिवार का सारा ध्यान अपनी ओर खींचता रहता है। एक औसत मध्यवर्गीय परिवार में वे उसके खान –पान,शिक्षा-दीक्षा आदि से सम्बन्धित देखभाल अपनी पूरी क्षमता से करते हैं। उनकी सारी गृहस्थी के केन्द्र में ये बच्चे ही होते हैं।धीरे धीरे बच्चे बालपन से किशोरावस्था में प्रवेश करते हैं।

कैशोर्य वह अवस्था है जब एक किशोर अपनी पहचान स्वयं तलाशने में व्यस्त रहता है।इस दौरान उसके अटपटे कृत्यों केआसपास उसका पूरा परिवार जुड़ा होता है। जीवन के सारे संभावित क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने या तलाशने मे एक किशोर की व्यस्तता उसकी एक अलग पहचान बनाने लगती है। उसके लिए संभावनाएँ ढूँढने और उसकी पहचान बनाए रखने में व्यस्त होता है उसका परिवार। फिर उसकी पहचान उसके परिवार के पहचान से जुड़ती चली जाती है।उसके कृत्यों से उसका परिवार गर्वित अथवा अपमानित अनुभव करता है।वह अपने परिवार के लिए शोभन अथवा अशोभन अनुभवों का कारण भी बनता है।
और अब युवावस्था में प्रवेश करते ही उसके स्वयं की पहचान का दायरा थोड़ा और विस्तृत हो जाता है। अब वह परिवार समाज और राष्ट्र की विभिन्न संस्थाओं की दृष्टि मे अपनी जगह बनाने के लिए प्रयत्नशील हो जाता है ।राष्ट्र के नागरिक के रूप में उसकी पहचान विविध दिशाएँ तलाशती हैं। परिवार समाज और राष्ट्र भी उसकी इस चेष्टा में उसकी यथासंभव मदद करते हैंऔर इस प्रकार अपनी एक स्थिर पहचान बनाने के लिए वहअपनी सम्पूर्ण क्षमता से वाक् कौशल, कल्पना कौशल और कार्य कौशल से अपने इर्द गिर्द को प्रभावित करता हुआ चतुर्दिक अपना प्रभाव छोड़ता है कभी कभी विश्व स्तर पर भी उसकी पहचान बनती है।यह वही मानव बल होता है जिसके सपनों पर आधारित सम्पूर्ण जग सपने देखता है, जिसके विकास से सम्पूर्ण जग विकास पाता है, जिसका विकसित अथवा अविकसित स्वरूप ही,राष्ट्र के विकसित अथवा अविकसित स्वरूप की पहचान होती है ।अतः, यह व्यक्ति के गर्व और स्वाभिमान से भरी पहचान की अवस्था होती है।प्रत्येक नाम का अपना महत्व और अपनी भूमिका होती है।
धीरे धीरे गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने की बदली हुई भूमिका भी सर्वत्र आकर्षण का केन्द्र बनती है।पति पत्नी माँ बाप के रूप में उसकी व्यस्तता जीवन के प्रसार में उसकी उलझन,समस्याएँ,जीवन की समग्रता की ओर उसे अग्रसर करती है ।एक महत्तर भूमिका में निमग्न वहशैशव ,कैशौर्य और युवावस्था की रंगीन कल्पनाएँ भी विस्मृत करता जाता है।

कुछ कालोपरांत इन सबों सेपरे होकर वह अचानक अपने को प्रौढ़ावस्था मेप्रवेश करता महसूस करता है ।जीवन के संचित अनुभव अब उसे तो जीवन दिशा देने का प्रयत्न करते ही हैं,साथ हीउन अनुभवों कोअपनी संतानों में भी बाँटने की कोशिश करता है।कर्तव्य,अकर्तव्य ,नीति अनीति,भूत भविष्य का अनुभवजन्य ज्ञान देने का प्रयत्न भी करता है,और सच पूछिये तो व्यक्तित्व संघर्ष का आरम्भ भी यहीं से होता है। युग चिंतन के परिवर्तित स्वरूप का भान उसे होने लगता है। अपने अप्रभावी होते उपदेशों,चिंतनों को वह शनैः शनैः अनुभव करने लगता है।एक दूसरी दुनिया उससे अलग और इतर भी खड़ी हो रही है,जो देशकाल के अनुसार नए सिद्धांतोंऔर नए मानदंडों पर चलना चाहती है जिसमें वह शायद ही कोई सहायता कर सकता है; इस बात का एहसास उसे होने लगता है ।अकेलेपन का प्रश्न भी उसके सम्मुख आ उपस्थित होता है अकेलापन इसलिए किनित्य परिवर्तित होते हुए मानदंडों ,मूल्यों का साथ उसका व्यक्तित्व खुलेपन से दे नहीं पाता।

आखिर क्यों होता है ऐसा?
क्यों बढ़ती है दो पीढ़ियों की दूरियाँ ?
पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी के साथ चल क्योंनहीं पाती ?
ये प्रश्न वृहत्तर सोच की ओर हमें अग्रसर करते हैं। पुरानी पीढ़ी अपनी जीवन भर की मान्यताओं और उलब्धियों की जंजीरों में इस कदर जकड़ी रहती है कि समानांतर सोच की ऋणात्मक और घनात्मक परिणामों को वह अपनी अनुभवजन्य तुला पर निरंतर तोलती रहती है।नयी सोचों की छोटी बड़ी उपलब्धियों को ,जो वैज्ञानिक पृष्टभूमि पर ही क्यों न आधारित हों अपनी दार्शनिक सोचों से आकलित करती रहती है।परिणामतः विचारों में संघर्ष का जन्म होता है। सुदूर व्यतीत अतीत और दूरस्थ भविष्य की चिंताओं में वर्तमान पीढ़ी अपनी वर्तमान की उपलब्धियों को नजरन्दाज नहीं कर पाती,उनकी अवहेलना कर नहीं सकती, अतेः,बुजुर्ग पीढ़ी के विधि निषेधों की वह विशेष परवा नहीं करना चाहती।
अब ऐसी स्थिति में क्या हो? किस प्रकार ये प्रौढ़, बुजुर्ग अपनी पहचान बचाएँ ।परिवारमें इनकी सुदृढ़ता पर प्रश्न चिह्न लग जाते हैं।
प्राचीन काल में हमारे मनीषियों ने इन्ही जीवन दशाओं का अनुभव कर चार आश्रमों की स्थापना की थी।ब्रह्मचर्य,गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास।उस समय की देशकाल जन्य अवस्थाएँ इसकी सहज मानसिकता और सुविधा दोनो प्रदान कर सकती थीं।पर आज स्थितियाँ सम्पूर्णतः भिन्न हैं।
वानप्रस्थ की कल्पना स्यात् इस अवस्था के लिए ही थी।नयी पीढ़ी की व्यस्तताओं से स्वयं को दूर कर वन को प्रस्थित हो गार्हस्थ्य से स्वयं को मुक्त करने की कल्पना। ऋषियों मुनियों, वेदादेश माननेवाले उच्च श्रेणीके लोगों ने, शासक वर्गों ने इसी रास्ते पर चलकर अपने उत्तराधिकारियों को समस्त कर्तव्य भार सौंपा और वन को प्रस्थान भी किया होगा।त्यागमय जीवन बिताने का संकल्प लिया होगा।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य में यह अवस्था उतने त्याग के लिए तैयार नहीं होती। शक्ति और इच्छाएँ जीवित रहने की स्थिति में व्यक्ति परिवार और समाज में अपनी स्थिति खोना नहीं चाहता, पर होता कुछ विपरीत है। समाज में नेतृत्व की कमान युवा वर्ग के हाथों में आने लगती है। निर्णय लेने का अधिकार भी धीरे धीरे हस्तांतरित हो जाता है,।उसके लिए शेष रहती है वह आदर सम्मान की भावना, जिसके वे अधिकारी हो सकते हैं, उनकी अनुभवजन्य समृद्धि, जो युवाओं को पथभ्रष्ट होने से रोक एक सही जीवन दिशा देने में समर्थ हो सकती है।पर, यह शायद ही संभव होता है ,युवा अधिकांशतः इसके लिए अतत्पर होते हैं।व्यक्ति की यह पारीवारिक और सामाजिक स्थिति उसे धीरे धीरे अकेलेपन की कगार पर लाकर खड़ी कर देती है, जहाँ उसकी पहचान गुम होने लगती है।

भगवान कृष्ण ने अपने प्रिय भक्त उद्धव को वानप्रस्थी और सन्यासियों के लिए कठिन जीवन धर्म बताये है,जिस पर चलकर तपस्वियों सा जीवन व्यतीत कर, कन्दमूल खा सन्तुष्ट रहकर,भगवद्भजन में लीन हो उन्हें मोक्ष मार्ग का चयन कर लेना चाहिए।और अगर, उससे सम्बद्ध विधि निषेधों का पालन न कर सकें तो स्वयं को बच्चों सा सरल बना लें, सबकुछ जानकर भी न जानने का नाट्य करें। अपनी इच्छाओं,आकाँक्षाओं,मर्यादाओं ,मान सम्मान की परवा न करें और अपने को उनकी इच्छाओं के अनुकूल बन जाने दें,।पर यह अनुकूलन क्या इतना सहज है ?
बड़ा कठिन है यह सब। यह गुम होती पहचान की अंतिम पूर्व अवस्था होती है जहाँ व्यक्ति खत्म होने लगता है काल अपनी सहज गति से चलता हुआ उसे ऐसे मुकाम पर पहुँचा देता है जहाँ उसकी इन्द्रियाँ क्षीण होने लगती हैं ।दुर्बल काया और क्षीण प्रतिक्रियात्मक अभिव्यक्ति सुख, दुख, क्रोध और दया की विगलन के अतिरिक्त शायद कुछ भी प्रदर्शित नहीं कर सकती।यह स्थिति अधिकांशतः उसे परिवार के लिए बोझ ,अग्राह्य बनाकर मात्र एक वृद्ध की संज्ञा दे उसकी पहचान को पूर्णतः समेट देती है।

वह,एक जमाने का कर्मठ ,एक वृहत परिवार का पालक,जीने की दिशा देने वाला, समाज मे प्रतिष्ठित स्थान रखने वाला-अन्यों की दया का पात्र बन जाता है कुछ प्रबुद्ध परिवारों में तब भी उनकी मर्यादा कुछ अंशों मे अप्रतिहत रहती है।पर आज बदलती सोच ,बदलती परिस्थितियाँ,और विकास पाते उपयोगितावादी दृष्टिकोण उन्हें या तो घर का एक निभृत कोना प्रदान करता है या कोई ओल्ड एज होम, वृद्धाश्रम,।आधुनिक सन्यास गृह कह सकते हैं उन्हें।
उपरोक्त सारी बातें शत प्रतिशत लोगों के लिए सच नहीं हो सकती । कुछ तो मृत्यु के बाद भी जीवित रहते और सम्मान पाते है पर अधिकाँश इस प्रकार जीवन काल में गुम होती पहचान के शिकार होते हैं।
वृद्धावस्था की इस स्थिति तक जीना है तो बड़ा कठिन,पर क्या उसकी परिणति ओल्ड एज होम ही होना चाहिए ? कभी-कभी तो लगता है कि गृह मे उपेक्षित ,अकेलापन भुगतते व्यक्ति के लिए ओल्ड एज होम भी एक वांछित सामाजिक वातावरण दे सकता है अगर उसका सही प्रबंधन होता हो।
वृद्ध कभी कभी स्वेच्छा से इसका चुनाव कर लेते हैं।आज की परिस्थितियों की अंततः विवशता ही तो है।हाँ ऐसे विवश लोगों के लिए ओल्ड एज होम की समुचित व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए।

किन्तु क्या यह एक नैतिक प्रश्न नहीं है ?–कौन उत्तर देगा-?आज नैतिक शिक्षा का शिक्षा व्यवस्था से लोप होता जारहा है।वृद्धावस्था की इस परिणति की कौन जिम्मेवारी ले—?कौन उत्तर दे–?

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