चंद लहरें

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भोर-कार्तिक का

Posted On: 30 Oct, 2015 Others,कविता,Hindi Sahitya में

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छाँव तारों से भरी
उजास मेघों की
बैठकी-पीपल के तले
भोर की शान्त मन्द वायु
कथाएँ नारायण की
गले मेंबँधी पड़ीअधगीली साड़ी
छोरों का ऊँगलियों से स्पर्श
जुड़े हाथों का प्रणमन
कार्तिक की पवित्र सुगन्ध से भरी धूम
स्निग्ध होता मानस
कृतज्ञता-
प्रकृति के अनछुए रहस्यों के प्रति
आशाएँ-
ज्ञात,अज्ञात जीवन की
सुलभ सरल सरसता से जुड़ी
ताल तलैया गंगा नदिया-
लौटते भींगे थके पैर
देहरी पर,
विश्राम की उसाँस।

—आशा सहाय –३० १० 2015

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
November 3, 2015

सार्थक प्रस्तुति हेतु आभार

ashasahay के द्वारा
November 4, 2015

धन्यवाद ,शिखा जी।

Shobha के द्वारा
November 4, 2015

आदरणीय प्रिय आशा जी आपने कार्तिक की भोर याद दिला दी आज कल दिल्ली में बुरा हाल है पंजाब में धान कटने के बाद खेतों में घास फूस जला दिया हैं वहाँ से हवा आ रही है उससे बुरा हाल है गला रुंध रहा है भनी आबादी वाले एरिया में सांस लेना मुश्किल है वायु जहरीली हो रही है परन्तु आपकी पंक्तियों ने मंद पवन स्वच्छ पवन का एहसास करा दिया |

Madan Mohan saxena के द्वारा
November 4, 2015

सुन्दर सटीक और सार्थक .सम्बेदनाओं से भरी पोस्ट बधाई कभी इधर भी पधारें

ashasahay के द्वारा
November 5, 2015

धन्यवाद श्री मदनमोहन जी,टिप्पणी अच्छी लगी।

ashasahay के द्वारा
November 5, 2015

आदरणीया शोभा जी ,मै यहाँ झारखंड में कार्तिक काअनुभव कर रही हूँ। दिल्ली की स्थिति से नित्यहीसमाचारपत्रों के माध्यम से परिचित हो रही हूँ साथ ही चिन्तित भी।कविता आपको अच्छी लगी,अतःबहुत धन्यवाद।


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