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आत्महत्या- बच्चों की--एक दृष्टिकोण

Posted On: 28 Mar, 2016 Others,Hindi Sahitya,Social Issues में

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आत्महत्याएँ आज के महत्वाकाँक्षी प्रतियोगितात्मक जीवन की सच्चाई बनती जा रही हैं। किसी के जीवन में कोई समस्या उत्पन्न हुई नही,और समाधान ढूँढे नहीं मिला तो आत्महत्या कर ली।जीवन नहीं तो समस्याएँ नहीं।आजकल युवाओं पर तो जीवन यापन से सम्बन्धित दबावों के सन्दर्भ में तरह-तरह केसामाजिक आर्थिक और राजनीतिक दबाव होते हैं ।संघर्ष मे अपनी अक्षमता को देख आत्महत्या का कायरतापूर्ण निर्णय ले लेना तो कुछ-कुछ समझ में आता है पर, आज विद्यालय जाने वाले छोटे बच्चों के द्वारा आत्महत्या किया जाना समझ में नहीं आता।कारण भी अजीबोगरीब ही होते हैं।बच्चे जो विद्यालय जाते हैं ,विषय नहीं समझ पाते और आत्महत्या कर लेते है।यह अत्यन्त सहज उपाय है—समस्याओं से छुट्टी पाने का।मध्य प्रदेश मे,हाल के समाचारों के अनुसार ,दो महीने में बीस बच्चों ने आत्महत्या कर ली।एक अन्य जानकारी के अनुसार दो दर्जन स्कूल जानेवाले बच्चों ने मध्य प्रदेश में आत्महत्याएँ कर लीं। एक अन्य जानकारी के अनुसार सन् 2012 ,2013,2014 में बढ़ती हुई विद्यार्थी- आत्म हत्याओं की यह संख्या क्रमशः193,218और223 तक पहुँच गयी थी।
आत्महत्याओं का यह सिलसिला,यह दौर इस बात की ओर ध्यान आक़ष्ट करता है कि कहीं घोर असंतोष है,और बच्चे आत्महत्याओं को अपराध नहीं समझते सिर्फअपनेअधिकार के तहत स्वयं पर किया गया जुल्म समझते हैं।
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— नितांत भौतिकवादिता ने आत्महत्या को धार्मिकअथवाआध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता ही नहीं समझी।बच्चों में यह प्रवृति आती अवश्य है।शारीरिक और मानसिक विकास के क्रम में बच्चे कुछ बातों को स्वीकार करना नहीं चाहते।किशोरावस्था में विशेषकर ऐसी भावनाएँ पनपती हैं।सामाजिक ,पारिवारिक और आर्थिक असुरक्षा की भावनाएँ ऐसी मनःस्थितियों को बल प्रदान करती हैं।पर, कुछ समय पूर्व तक माता- पिता और संयुक्त परिवार के अन्य सदस्य इन मनःस्थितियों को आत्महत्या की मनःस्थिति तक पहुँचने ही नहीं देते थे।परिवार के बुजुर्गों,बड़े बूढ़ों का उनको पर्याप्त सहारा मिलता था।उनकी कमियों को वे सहलाने का कार्य करते थे।बहुत सारे आचरणों कोपाप पुण्य की परिभाषा केअन्तर्गत लाकर बच्चों में एक विशेष प्रकार के संस्कार भर देने की कोशिश करते थे।आज का एकल परिवारआध्यात्मिक सोचों और धार्मिक पाप पुण्य की व्याख्या करने की आवश्यकता ही नहींसमझता।आधुनिक शिक्षित समाज में माता- पिता अथवा अभिभावकगण प्रत्येक कार्य के पीछे कारण की अवधारणा को ही– वैज्ञानिक सोचों को विकसित करने के क्रम में बच्चों में भरना चाहते हैं। पाप और पुण्य जीवन में नगण्य है।परिणामतः बच्चों में इस प्रकार की अनुशासनात्मक भावनाओं काअभाव होता है।

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—-दूसरी ओर, आज के सन्दर्भ में देखा जाय तो बच्चों केउपर पढ़ाई का दबाव, अवांछित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का दबाव,, अधिक अंक प्राप्त करने का दबाव बहुत अधिक है।बचपन खेलने कूदने खाने पीने को स्वतंत्र नहीं है।पुस्तकीय ज्ञान के अतिरिक्त कम्प्यूटर या हर जगह साथ रहनेवाला लैपटाप इत्यादिभी जहाँ उनके ज्ञान को विकसित करने में सहायक होते हैं ,सक्रिय खेलों मेंउनकी उन्मुक्त भागीदारी का समय छीन लेते हैं।संतुलित स्वस्थ मस्तिष्क के लिए खेलों की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता।.नकारात्मक भावनाओं सेदूर रहने एवम् समस्याओं से जूझने की शक्ति अर्जित करने में खेल कूद की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।व्यक्तित्व में निर्भयता आती है।.अगर ऐसे शारीरिक व्यायामों के पर्याप्त अवसर नहीं मिलें तो व्यक्तित्व एकांगी हो सकता है।
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—आधुनिक विकसित विद्यालयी पाठ्यक्रमोंमेंखेलकूद का समावेश तो है।घंटियाँ भी तय है,,शिक्षक भी नियुक्त हैं, पर उन सभी का सही सदुपयोग होता है या नहीं, यह एक प्रश्नचिह्न ही है।पर, हर क्षेत्र की प्रतियोगितात्मक भावनाएँ उन्हें चैन नहीं लेने देतीं और बुद्धिलब्धि अगर कम हो या अनुकूल नहीं हो तो हताशा हाथ लगती है।
— इस सम्बन्ध में माता पिता अथवा अभिभावकों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं। माता-पिता अपने बच्चों की प्रतिभा की पहचान नहीं करते।आजकल उनकी विषय सम्बन्धी रुझान को जाँचने अथवा पहचानने हेतु मनोवैज्ञानिक संस्थाएँ भी हैं,फिर भी औसत दर्जे तक के अभिभावक उसकी सेवा लेने मेंअसमर्थ होते हैं।बात सिर्फ असमर्थता की नही महत्वाकाँक्षाओं की भी है।अभिभावक अपनी महत्वाकाँक्षाओं पर बच्चों की इच्छाओं की बलि चढ़ा देते हैं।
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— बच्चों का लालन पालन भी इसके लिए कम जिम्मेवार नहीं।बच्चों के साथ असंतुलित व्यवहार किया जाता है।या तो वे बच्चों को अत्यधिक लाड़ प्यार मे अत्यधिक सुविधाओं के बीच पालते हैं और इस प्रकार उनकी इच्छाओं को बढ़ाते चले जाते हैं या ईच्छाओं को दबाते जाने की सीख देते हुए उन्हें हीन मनोवृति का शिकार हो जाने देते है।इन दोनो ही अतिवादी स्थितियों में बच्चे स्वयं को ही असहनशीलता के शिकार बना डालते हैं।
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-उपरोक्त बातें सामान्य सभी बच्चों के घरेलू स्तरों परव्यवहारजनित स्थितियों के संदर्भ में सत्य हो सकती है.,पर आज आर्थिक रूप से विशेष सम्पन्न बच्चे जिन विद्यालयों में प्रवेश करते हैं वहाँ हर तरह की सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं, पर क्या सभी विद्यालय सही ढंग से अपनी जिम्मेवारियों का निर्वाह करते है?विद्यालय स्तर पर भी बच्चों को शिक्षित करने के दृष्टिकोण से बहुत सारी बातों का ध्यान रखना अनिवार्य है।
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— बाल मनोविज्ञान बच्चो केप्रति व्यवहार मे काफी सतर्कता की सलाह देता है।बच्चों के अन्तर्निहित गुणो को समझने के लिए उनके साथ सदैव सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार की अपेक्षा होती है।शिक्षकों और विद्यालय प्रशासनअथवा व्यवस्थापकों का व्यवहार सदैव संगत होना चाहिए।
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-बच्चों की शारीरिक कमियों की ओर सदैव ध्यान होना चाहिए।बच्चों के साथ आँख अथवा कान से सम्बन्धित समस्याएँ हो सकती हैं। एक ही आयुवर्ग केबच्चों की लम्बाईअसामान्य रूप से भिन्न हो सकती है। कमियों की जाँच व्यवस्था के साथ उन्हें मनोवैज्ञानिक स्तर पर बल प्रदान करने की भी आवश्यकता होती है। उपरोक्त दोनो ही स्थितियों में वे हीन भावना के शिकार हो जा सकते हैं।
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-जो सबसे महत्वपूर्ण बात है और जिसकी करीब करीब हर जगह अनदेखी होती है वह यह कि एकआयुवर्ग के बच्चों की शिक्षा उनकी बुद्धिलब्धि के अनुसार नहीं दी जाती।मंदबुद्धि और तीव्र बुद्धिवाले एक कक्षा के विद्यार्थियों को एक ही प्रकार से,एक ही पाठ्यसामग्री से पढ़ाया जाता है। यह अनुचित है।
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पाठ्य विधि में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं।ऐसा देखा गया है कि देश विदेश के कुछ प्रसिद्ध शैक्षिक संस्थानों में एक ही कक्षा के विभिन्न स्तर के बुद्धितब्धि वाते बच्चों को उनके अनुरूप शिक्षण की व्यवस्धा कर अनुरूप प्रश्नपत्रों आदि की व्यवस्धा कर सात्रिक परीक्षा के अंक अधवा ग्रेड दिये जाते हैं।बच्चे ऐसी स्धिति मेअपने को संतुष्ट भी अनुभव करते हैं। ,प्रत्येक स्तर के छात्र के बुद्धि स्तर का विकास भी होता है, साथ ही उनमें हीन भावना भी घर नहीं कर पाती।अतः प्रत्येक वच्चे की क्षमताओं का ध्यान रखते हुए भी उन्हें किसी से पृथक नहीं होने का अनुभव कराना भी आवश्यक होता है।
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-विषय को रुचिकारक बनाकर प्रस्तुत करने, प्रयोगात्मक शिक्षण पर बल देने,और,नये –नये सहायक शिक्षण सामग्रियों के प्रयोगों से बौद्धिक क्षमताओं का विकास होता है और विषय को समझने जनित निराशा भी दूर होती है।
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-बच्चों को निराशाजनक मनोवृतियों से दूर रखने के लिएशैक्षिक संस्थानों के माहौल को स्वास्थ्यकर बना कर रखना भी आवश्यक होता है।ऐसा देखा गया है कि बाल्यपन सेही ,अथवा किशोरावस्था तक पहुँचते पहुँचते बच्चे बुरी संगति में पड़ जाते हैं। विद्यालय –जहाँ हर तबके के बच्चे पढ़ने आते हैं, वहाँ बुरी संगति की अधिक संभावना रहती है। बच्चे हल्की फुल्की नशाखोरी के अभ्यस्त होने लगते हैं।यह उनके मस्तिष्क को कमजोर बना देती है। ऐसी स्थिति में कोई भी विषय उनके लिए अग्राह्य हो सकता है।मध्य या माध्यमिक विद्यालयों मे यह स्धिति बच्चों के लिए खतरनाक सिद्थ हो सकती है। विद्यालय और, घरेलू दोनो ही स्तरों पर तत्सम्बन्धित सतर्कता की आवश्यकता है।यह स्थिति आत्महत्याओं की बड़ी संभावनाओं को जन्म देती हैं।
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— तथाकथित उच्चस्तर के विद्यालयों में दंड एवं पारितोषिक प्रदान करबच्चों को अपने व्यवहार एवम् उपलब्धियों के प्रति सचेत करने की अच्छी प्रथा है।दंड व पारितोषिक पाए बच्चे लाल अथवा काले बिल्ले लगाए जब विद्यालय में घूमते हैं अथवा बसों पर बैठकर घर जाते हैं तो नसीहतों के भय से अथवा हीनभावना के कारण वे कभी-कभी ऐसे गलत कदम उठा सकते हैं।अतएव सावधानी बरतने की आवश्यकता है कि इन दंड व्यवस्थाओं से किन बच्चों को ठेस पहुँचती है और कौन इन्हे सकारात्मक रूप में ग्रहण करता है।
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-आज शिक्षक की भूमिका बदल गयी है।वे बच्चों के स्वाभाविक विकास की निगरानी करते हुए उन्हें भटकने से रोकते हैं,उनके स्वाभाविक विकास में उनकी सहायता करते हैं।विषय चयन में उनकी मदद औरविषय की कठिनाइयों को आसान करने का कार्य़ करते हैं।यही भूमिका माता पिता अथवा अभिभावक की भी होनी चाहिए।अपनी ईच्छाओं ,आकाँक्षाओं को लादने के बजाय उनकी अपनी राह पर आगे बढ़ने को प्रेरित करना उनका कर्तव्य होना चाहिए।
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–मात्र पठन पाठन ही नही , अन्य कई घरेलु एवम् सामाजिक कारणों सेभी बच्चे, लज्जित एवम् प्रताड़ित महसूस करते है और वे अपने अस्तित्व को ही समाप्त करने का निर्णय ले लेते हैं। छोटे –छोटे बच्चों का यौन उत्पीड़न भी उनमें से एक है। एकल परिवार में माँ बाप का असंतुलित व्यवहार,मार पीट आदि से बच्चों मे असुरक्षा घर कर लेती है, परिणामतः वे अपने जीवन को ही समाप्त करने की कोशिश करने लगते हैं।घोर दरिद्रता आदि भी कारक तत्व हो सकते हैं । आवश्यकता है हर मोर्चे पर सतर्कता की,, परिवार, समाज,विद्यालय और राष्ट्र की तत्सम्बन्धित जागरुकता भरे प्रयासों की ,जो राष्ट्र की इस बहुमूल्य पूँजी और भविष्य की राष्ट्र- शक्ति को आत्म हत्याओं से रोक सके।–
बस—

आशा सहाय -28 -03-2016—।

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
March 28, 2016

प्रिय आशा जी लेख क्या है आत्म हत्या के हर कारण की आपने समीक्षा की है बहुत ज्ञानवर्धक लेख

ashasahay के द्वारा
March 28, 2016

आपने पढ़ा ,बहुत धन्यवाद डॉ शोभा जी। आभार।

pkdubey के द्वारा
March 30, 2016

आदरणीया यह आज के समय की ज्वलंत समस्या है ,पहले आत्महत्या ,ह्त्या सुनकर डर सा लगता था ,अब तो यह प्रचलन हो गया है ,इसे कैसे नियंत्रण में लाएं यह बहुत गम्भीर और सोचनीय विषय है |

ashasahay के द्वारा
March 31, 2016

धन्यवाद श्री पी के दुबे जी आपकी चिंता स्वाभाविक है।एक बार पुनः आाथ्यात्मिक विचार धाराओं के घर घर में प्रवेश की आवश्यकता है।

ashasahay के द्वारा
April 1, 2016

धन्यवाद डॉ कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी ,आपने पोस्ट को इस योग्य समझा । आभार।


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