चंद लहरें

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जनताका विश्वास किसे और क्यों –एक दृष्टि।

Posted On: 15 Apr, 2017 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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विधानसभा केग्यारह उपचुनावों में छः स्थानों पर भाजपा को पुनः विजय प्राप्त होना जहाँ कौतूहल उत्पन्न करता हैवहीं एक विशेष जिज्ञासा भी जाग्रत होती है कि आखिर देश के हर क्षेत्र की जनता क्या चाहती है, उसके मन में है क्या! क्या यह अन्य दलों के प्रति निराशा काप्रगटीकरण मात्र है या भाजपा के वादोंऔर कार्यप्रणाली से सम्बन्धित चेष्टाऔं के प्रति सहमति।यह लहर निरंतर लोगों के विश्वास से पोषित हो रही है।ऐसा प्रतीत होता हैकि विरोध की पराकाष्ठा की यह अनिवार्य प्रतिक्रिया है.।इतना तो स्पष्ट है कि जनता अब विकास चाहती है।स्पष्ट और सीधे सुधारों में विश्वास करती है।खुशामद नहीं ,व्यर्थ केवादे और बहकावे उसे समझ में आने लगे हैं अतः पार्टी कोई भी क्यों न हो उसके द्वारा कठोरतापूर्वक लिए गए सद् निर्णयों में वह अपना विश्वास व्यक्त करना चाहती है।किसी एक सकारात्मक कदम से होनेवाली कठिनाईयोंको थोड़े बहुत ऩा नुकुर के साथ सहन करतीहै और उससे होनेवाले प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष लाभकी आकाँक्षी प्रतीत होती है।तभी केन्द्र कीसत्तासीन सरकार नेउत्तर प्रदेश जैसे राज्य में इतनी बड़ी सफलता भी हासिल कीसाथ ही गोआमे काँग्रेस की दृष्टि में आनेवाली शिथिलता नेउन्हें यह सोचने को विवश किया किकाँग्रेस जैसी पार्टी अब परास्त होती जारहीहै।अपने तिकड़मों से भीसफल नहीं हो पा रही। बात अभी बहुत पुरानी भी नहीं हुई है।अचानक जोबात ध्यान में आती है वह यह कि इन सबों के पीछे विपक्षी नेताओं केभोंड़े आधारहीन,महत्वहीन और बचकाने वक्तव्य तो नहीं जिनसे जनता ने उनके प्रति निराशा पाल ली!
विपक्ष के रूप में विपक्षी पार्टियों ने बुद्धिमानी धैर्य और प्रौढ़ता का परिचय तो नहीं ही दिया,वरन दिशाहीनता से देश को भ्रमित करने की भी कोशिश की।सिर्फ काँग्रेस ही नहीं,दिल्ली की आम आदमी पार्टीबंगाल की तृणमूल काँग्रेस, बी एस पी आदिएवम् कुछ वामपंथी पार्टियों ने भी विशिष्ट एवं उन महत्वपूर्ण मुद्दों की पर विरोध प्रगट किया जिनका विरोध करना कभी भी तर्कसंगत नहीं माना जा सकता।जिनके विरोध में उनका घोर स्वार्थ भी स्पष्ट होता रहा।उन्ही दिनों उन्होंने संसद की कार्रवाईयों को आगे नहीं बढ़ने देकर सरकार के प्रतिजनता के मन में अविश्वास पैदा करने की चेष्टा की।.अब भारतीय जनता विवेकपूर्ण निर्णय लेना जानती है अतः उनके सारे के सारे वार उल्टे ही पड़ गये।देश को अत्याधुनिक जगत के साथअथवा उसके अनुरूप आगे बढ़ाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय जगत के विकसित तकनीकों कासहारा ले राजनीतिऔर अर्थनीति में सुधार लाना आवश्यक था। पर भारत का मध्यवर्गीय चिंतन और रहन सहन आधुनिक काल के आरंभिक स्वरूप सेआगे बढ़ने नहीं पाए इसकी उन्होंने पुरजोर कोशिश की।पर, जनता अब बहुत दिशाहीन और मूर्ख नहीं,वह इन वाग्विलासों को, चातुर्य को ,वादे कर मुकर जाने की स्थितियों से भली भाँति अवगत हो चुकी हैपरिणामस्वरूप ही आज उपर से कठोर प्रतीत होने वाली उत्तर प्रदेश की शासन व्यवस्था का भी कठोरता के आधार पर सशक्त विरोध नहीं कर पाती। तभी वह प्रयत्नों की पवित्रता की कद्र करती है।हो सकता है उत्तर प्रदेश सरकार के कुछ कदम सही नही लग रहे हों,उनके विरोध की प्रबल संभावना बन रही हो,पर भविष्य में ये कदम शान्ति व्यवस्था स्थापित करने में मददगार सिद्ध होंगे।
एक हास्यास्पद स्थिति जो पुनःमाहौल मेंचरित्र उजागर करने में सहायक हो रही हैवह है ई. वी एम का मुद्दा।चुनावों मेंविजय प्राप्त करने के पीछे कुछ दल ई वी एम में छेड़छाड़ की संभावना जता रहे हैं,और पुनः मतपत्रों और मतपेटियों पर विश्वास व्यक्त करना चाहते हैं ।अगर ऐसा है तोजीते गये सभी क्षेत्रोंकीसभी पार्टियों के सम्ब्न्ध में यह क्यों नही सच हो सकता । काँग्रेस के अमरेन्दर सिंह का वक्तव्य बहुत मायने रखता है कि ऐसी स्थिति में पंजाब की सत्ता भी उनके हाथों में नहीं होती। आखिर पंजाब को उनके लिए क्यों बख्श दिया गया। क्या पंजाब का शासन अपने हाथों मे लेने से भाजपा—अकाली डर गए थे।
यह किसी के लिए अज्ञात नहीं है परिणामतःबहुत बड़ी हास्यास्पद सोच हैकि बैलेट पेपर से मतदान अधिक सुरक्षितऔर प्रामाणिक है।बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्सों की प्रामाणिकता तोबहुत सारे चुनावों में पहले ही संदिग्धता के घेरे में आचुकी है।अतः ऐसा कहना चुनावों मे विश्वसनीयता लाने के आग्रह हेतु नहीं वरन् चुनावों में सदैव संदिग्ध आचरण बरतने वाली पार्टियों की स्वार्थपूर्ति के लिए ही सही हो सकता है।मतपेटियाँ बदली गयी हैं,कुएँ में फेंकी गयी हैं। मतपत्र फाड़े गए हैं और न जाने कितनी धाँधलियाँ की गयी हैं।यह एक तिकड़मपूर्ण मनोवृति है उनके लिए जो चुनाव जीतने के लिए किसी हद तक निम्न स्तर का काम कर सकते हैंऔर बाहुबल को प्रमुख स्थान देते हैं।आगे बढ़कर संशोधित प्रक्रियाओं को अपनाने केस्थान पर हम पीछे क्यों जाना चाहते हैं ?
अभी के उपचुनावों के परिणाम पुनःजनता की बदलती उस मनोवृति की और सेकेतित करती हैजो छल कपट नहीं चाहती ,जन सेवा के प्रति समर्पण चाहती हैऔर सफल होने योग्य वादों के प्रति स्वयं भी समर्पित होना चाहती है।
पुनःपिछली टिप्पणियों कीओर दृष्टिपात करने पर एकऔर हास्यास्पद स्थिति आकृष्ट करतीहै कि भाजपा जैसी पार्टी ने मुस्लिमबहल क्षेत्रों मेकैसे विजय पायी ? यह प्रश्न वेही कर सकते हैं जिन्होंने सदैव धर्मभेद और जातिभेद के नाम पर सदैव चुनावव जीते हों। क्या यह इस ओर ईंगित नहीं करता कि आज मुस्लिमम समुदाय भी अन्य दलों द्वारा किसीदल विशेष के प्रति किए विष वमन को अनसुना और अनदेखा करना चाहताहै और एक बार विकास के मुद्दे पर विश्वास को परखना चाहता है! अगर वे भी अपने को मुस्लिम से अधिक मानव समझते हैं तोमानवीय हित से जुड़ी बातों को अवश्य ही प्राथमिकता देना चाहेंगे।धर्म के नाम पर नहीं बाँट पाना ही तिलमिलाहट का मूल कारण है।ऐसा नहीं है कि उत्तर प्रदे श के मुख्य मंत्री केहर कदम उन्हें अच्छे ही लग रहे होंगेपर उनके खरेपन और सच्चाई,उनकी तत्परता ,समर्पण,संलग्नता और सुधारों के जज़्बे की अवश्य ही कद्र की जाएगी।
यह समय बाकी सभी दलों के लिए अपने अन्दर झाँकने का है।दल के भीतर मूलभूत परिवर्तन करने का समय है।सांगठनिक पुनर्गठन के साथ साथअपने आदर्शों ,सिद्धांतों को खँगालने एवंईमानदारीपूर्वक पुनरुज्जीवित करने का हैचुनावी वादे तो उन्होंने भीउतने किएहीहोंगे।मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करनेकी योजनाएँ भी सबों ने बनायी ही होंगी।बनानी हीपड़ी होंगी।यह तो प्रथम आवश्यकता थी ।बिजली पानी ,घर अन्न ,सस्ता भोजन ,वस्त्र तेल पेट्रोल गैस आम वायदे हैं सबसिडी देकर भी मदद करनी ही चाही।पर यह अपर्याप्त और लोगों के मनोबल को तोड़ता ही रहा, आश्रित बनाता रहा।मनोबल को ऊँचा उठाकर रोजगार के अधिक अवसर प्नदान करने की चेष्टा और भ्रष्टाचार मिटाने की चेष्टा ईमानदारी से संभवतःनहीं की गयी।
भ्रष्टाचार सबसे बड़ मुद्दा बन गया।हर क्षेत्रमें—सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक।घूसखोरी, टैक्सचोरी छोटी छोटी बेईमानियोँने सामान्य जनता से लेकर बड़े बड़े अधिकारियों और राजनीति सेजुड़े चेहरों को भीआकंठ भ्रष्ट कर दिया।इन सबों से लड़ने की मानसिकता को दलों ने त्याग दियाक्योंकि इन सबों के सहारे ही वे चुनाव जीतने और सत्तामें आने का स्वप्न वे देखते रहे।भ्रष्टता का पोष,ण किया उन्होंने।यह तो वह खाई है जिसकी राह अत्यधिक ढलानयुक्त है।जिन्होंने विरोधकिया वे प्रकारांतर से दंडित होते रहे।यह बात शतप्रतिशत नहीं तो अधिकांशतः तो अवश्य सत्य रही।
भ्रष्टाचार में लिप्त जनता उस तबके को पसन्द नहीं आती जो वैचारिक रूप से सजग होते हैं।.अतः भ्रष्टाचार विरोथी मुहिम में लोग साथ देने को प्रस्तुत हो गये।नैतकता केप्रति इषत् आग्रह आर भय से वे भी साथ हुए जो स्वययम् आकंठ डूबे थे।भ्रष्टाचार भी एक व्यसन है जो मद में विवेक का हरण कर लेता है।उसे बलात छुड़वाने का उपाय तो करना ही होगा शराब की तरह इसे भी कानून की सख्ती की आवश्यकता है।राजनीति दुरूह होती है और जनता सावधान।किसी एक दल के प्रति आँखें मूँदकर अब कोई विश्वास करना नहीं चाहता ।
जनता अब यह भी नहीं चाहेगी किजिस प्रकार लम्बे काल तक सत्ता में रहकरएक अच्छी विश्वासप्राप्त पार्टी जिसनेस्वतंत्रता संग्राम में मुख्य भूमिका का निर्वाह कियाया अन्य वे पार्टियाँजो समय समय पर आगे बढ़कर मिली जुली सरकार के रूप, में सामनेआईं और जिनकीअसमर्थता या ढुलमुल नीति ने उन्हें स्थानच्युत किया,के समान हीलम्बे समय तक सत्ता में रह वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी भी भ्रष्ट न हो जाय। सत्ता भ्रष्ट भी करतीहै।अधिकारबोध सुशासन को भूल जाया करता है।इस स्धिति से बचने के लिए अन्य पार्टियों को भी सतर्कताऔर आत्मावलोकन की आवश्यकता है।जिम्मेदार प्रबुद्ध लोगों को जगह देने आवश्यकता है।परिवारवाद अथवा भाई भतीजावाद की परम्परा का त्याग करना देशहित में आवश्यक है।नयी योजनाएँ क्रियान्वयन के नये तरीके ढूँढ़ने की आवश्यकता है।आफिस आफिस काखेल न खेल त्वरित गति से समस्याओं को निबटाने का जज्बा पैदा करने की आवश्यकता है।सशक्त और प्रौढ़ विपक्ष की भूमिका की भी लोकतंत्र में सशक्त भूमिका होती है। सत्ता या विपक्ष दोनों ही सशक्तता की माँग करता है।
वर्तमान सत्तासीन सरकार की कुछ नीतियाँ आधुनिकता की ओर अग्रसर भारतीय समाज को अब शायद रास नहीं आएँगी।गोरक्षा के नाम पर संघर्ष ,लव जेहाद के नाम पर निर्दोष लोगों को प्रेमी युगल समझकर पकड़लेना ,बंदी बना लेना और अरमानित करना, वैलेंटाइन डे का बेमानी अत्यधिक विरोध कर अत्याचार करना अब आत्मघाती कदम हो सकते हैं हम भारत को अब सदियों पीछे नहीं ढकेल सकते।अनाचार का विरोध करना उचित है परभावनाओं की पवित्रता की भी रक्षा करनी होगी।सदाचार औरभारतीय संस्कृति के प्रति जागरूता संवादों और सामाजिक प्रयत्नों से संभव है।

आशा सहाय 15—4—2017—।

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