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समस्याएँ--अन्दर बाहर

Posted On: 17 May, 2017 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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देश अन्दर और बाहर ढेर सारी समस्याओं से जूझता हुआ आगे बढ़ रहा है।कुछ समस्याएं दृष्टिगत ही बड़ी हैं और उनके समाधान की माँग हर राष्ट्रप्रेमी तहे दिल से चाहता है और कुछ समस्याओं के समाधान होने, न होने के प्रति सामान्य जनता उदासीन प्रतीत होती है क्यों कि उनका समाधान जिस बेहतरी के लिए आवश्यक है उसके प्रति उनका विशेष आग्रह इसलिए नहीं होता कि उस दशा में वे जीने के आदी रहे हैं ।जनता आज कश्मीर समस्या के हल के लिये एक समान व्यग्र है चाहे उनका जीवन स्तर कैसा भी हो। ,चाहे वे समाज मे फैले भ्रष्टाचार के आए दिन शिकार होते रहते हों। स्वच्छता कार्यक्रम उनके जीवन में नहीं के बराबर मायने रखता हो,समाज मे हो रहे व्यभिचार उनके लिए चर्चा का विषय बनते बनते रह जाता हो। यह सत्य है कि यह उच्चस्तरीय मानसिकता नहीं है ,पर सामान्य मानसिकता जो, चीजों, घटनाओं को सुन जानकर भुला देने वाली होती है, वह ऐसी ही होती है।भ्रष्टाचार से सम्बन्धित समस्याएँ उनको तभी प्रभावित और आन्दोलित करती हैंजब वे स्वयं उससके शिकार होते हैं ।अबतक वे भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचार से काटने के अभ्यस्त हो चुके हैं और यह सब उन्हे सहज जीवन का अंग प्रतीत होता है।यह एक नजरिया है समस्याओं को देखने का पर प्रबुद्ध लोगों का नजरिया बिल्कुल विपरीत भी हो सकता है।
दोनो ही स्थितियों मेंजहाँ राज्य और सरकार की अनिवार्य भूमिका की हम माँग करते हैं, हम पूर्णतः सजग और सतर्क हो जाते हैंऔर उनके प्रति आक्रामक मूड मे बने रहना चाहते हैं। वाह्य आक्रमण ,आतंक अथवा कश्मीर जैसे मुद्दे पर हर व्यक्ति अपना मत अभिव्यक्त कर सरकारी प्रयत्नों को कटघरे में खड़ा करने को व्यग्र रहता है।कश्मीर की समस्या है भी कुछ ऐसी।मुझे लगता है मुख्य समस्या अभी पत्थरबाजी की ही है जिसने सामान्य जन जीवन को बुरी तरह आहत कर दिया है, और कुछ खास स्थानों में जहाँ उनके छिपे होने की आशंका है जो भारत विरोध के लिए सक्रिय हैं,। कभी कभी लगता है ये वारदातें शह दी हुयी हैं।वहाँ के आतंकवादी ,अलगाव वादी नेता गण संभवतः डर से कोई बड़ी कारवाई करना नही चाहते अथवा उनसे किसी नकिसी प्रकार पोषित भी हैं।केन्द्र सरकार से भी ऐसा करने की अप्रत्यक्ष सलाह देकर जिस अनिश्चय से भरी भयभीत मानसिकता का प्रमाण देना चाहते हैं वह स्तुत्य नहीं है ।कश्मीर मुख्यमंत्री का दिल्ली आकर प्रधान मंत्री से मुलाकात कर मीडया को भी इस बात का विश्वास दिलाना कि बातचीत ही समस्या का एकमात्र समाधान है और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की नीति ही सही नीति है, कुछ इसी ओर संकेतित करता है।. मूल रूप से उस नीति से भारत अभी भी पीछे नहीं हटना चाहता पर उसके परिणामों से पूर्णतः संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता।बातचीत किससे?उनसभी आतंकी, अलगाव वादी गुटों के साथ—या पाकिस्तान के साथ करबद्ध मुद्रा में?यह भारतीय स्वाभिमान के खिलाफ है।उनसे बातें करना तो घुटने टेकने के समान है।हो सकता है वहाँ के सीएम को अपनी सत्ताऔर सुरक्षा दीखती हो,मुफ्ती मुहम्मद सईद के गृह मंत्रित्व काल मेंबंदी पाच आतंकियों को छुड़ाने से सम्बन्धित ऐतिहासिक समझौता आजतक धुटने टेकने जैसा ही शर्मनाक प्रतीत होता है। ।हो सकता है समझौता के सिवा उन्हें अन्य कोई राह नहीं दिखती। कभी कभी तो पत्थरबाजी के पीछे भी जम्मू कश्मीर सरकार की मौका परस्ती दीखती है। सरकार प्रशासन के नाम पर सेना को भी सहते जाने और करीब करीब निष्क्रिय रहने की सलाह देना उकसाने और प्रश्रय देने के समान है।
यह अलग बात है कि कश्मीर के नौजवानों की समस्याएँसरकार सुने उनके लिये नौकरियों में अधिक से अधिक नियोजन के उपाय करे,उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़े पर उदंडता और अपराथ को बिना किसी विशेष कोटि में रखे दंडित करे।आंतरिक-अपनी ही व्ववस्था के कमो वेश सम्मिलित होने और शह देने की बात इसलिए भी उठती है कि फारुक अब्दुल्ला जैसे मँजे राजनीतिज्ञ ने भी कश्मीर के विवादास्पद अथवा अविवादास्पद होने के मसले पर श्री नगर संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव के पूर्व भ्रामक बयान ही दिए । ऐसा लगा जैसे दोतरफी बातें कर चुनावी माहौल मे मात्र समर्थन ढूढ़ने की कोशिश करते रहे।आतंकवाद समर्थक लोगों को अगर कोई अपना वोट बैंक बना ले तो उनके द्वाराआतंकवादियों के न तो सफाए की उम्मीद की जा सकती है न उपाय सुझाए जाने की। कुल मिलाकर गहरा भ्रामक माहौल है ओर सख्त निर्णय लेने की आवश्यकता है।
दूसरी ओर पाकिस्तान का बार बार इस गंदी हरकत में अपनी संलग्नता से इन्कार करना कि जवानों का बुरीतरह अंग भंग करनाउनकी युद्ध नीति के विरूद्ध है, पाकिस्तान सरकार के दोहरे चरित्र की ओर संकेतित करता है ।अत्यधिक कमजोर प्रशासन जहाँ सेना पर पकड़ न के बराबर है और सेनाआतंकियों केसाथ मिलककर आतंकियों का साथदे भारत को परेशान करने की योजना बनाती रहती है। और अब तो कई स्थानों पर एल ओ सी का उल्लंघन कर युद्दध जैसी स्थितियाँ भी पैदा कर दी हैं।सर्जिकल स्ट्राइक के बाद यह स्थितिऔर गम्भीर होती जा रही है।
यह अच्छी बात है कि हम अपनी सामरिक शक्ति पर गर्व करेंऔर हमारा मनोबल दिन प्रतिदिन द्विगुणित होता रहे।पर यह सामरिक शक्ति पाकिस्तान को पराजित करने के साथ-साथ चीन को भी पराजित करने की एक साथ सामर्थ्य रखती हो तोबार बार उकसाई गयी स्थिति से जूझा ही जा सकता है।युद्ध की स्थिति में चीन के उसके साथ जुड़ जाने की प्रबल संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
अन्तर्राष्ट्रीय समर्थन से भारत पल्ला झाड़ नहीं सकता। उसे अभी विश्व पटल पर एक शक्तिशाली एवं जिम्मेदार देश के रूप ममें अपने को स्थापित करनाहै परिणाम स्वरूप अपने कार्यकलापों को तदनुरूप उसे नियंत्रत करने की भी आवश्यकता है।पाकिस्तान को अलग थलग करने की उसने सार्थक कोशिश की है पर बहुत सारी कार्यवाइयों के लिए उसे अन्तर्राष्ट्रीयरुख का ध्यान भी रखना ही पड़ेगा।बलपूर्वक यह कहने की इच्छा होती है किहम समर्थ हैं ,हम दबे क्यों, हम बदला लेंगेपर शीघ्रता से बदला लेना और समर्थन कोनहीं खोना, अब यह आवश्यक प्रतीत होता है।लगताहै त्वरित गति से कुछ और सर्जिकल स्ट्राइक की आवश्यकता है।
चीन पाकिस्तान का अन्यतम समर्थक हो रहा है। आर्थिक गलियारेके निर्माणमेउसकी सहभागिता दोनों के कूटनीतिक सहयोग का प्रमाणहै जिसका एक उद्येश्य उभरती हुई शक्ति भारत को घेरना भी हो सकता है।चीन के आर्थिक गलियारे ने सन ‘48—‘49 में स्वरूप लेना आरम्भ किया।इसके पूर्व भारत मे कबीलाई आक्रमण हो चुका था और कश्मीर का एकहिस्सा पाकिस्तान अधिकृत तो हो चुका था।पर पाकिस्तान खदेड़ दिया गया था और उसे अपनी तत्कालीन शक्तिहीनता का परिचय मिल चुका था। ऐसी स्थिति में उसभाग पर अपने कब्जे को बनाए रखने की योजना मे अगर उसे किसी बहाने चीन का साथ मिलता है तो यह उसके लिए महत्वपूर्ण है पर भारत के लिए चिन्तनीय विषय है।कश्मीर के उस भाग मेंविरोध के स्वर उठ रहे है । यह एक सोची समझी चाल है जिसमें दोनो ही साथ हैं।प्रकान्तर से साम्राज्यवादी चीनव्यापार के बहाने अपनी सांस्कृतिक साम्राज्य की पहचान बनाना चाहताहै ।भूभाग को हड़प कर भारत के स्वाभिमान को आहत करना तो उद्येश्य है ही।
हम भारतवासी प्रकृति से आलसी हैं और वे दुरुस्त।हम साहस कर सकते है पर प्रयत्नों के समर्थन के लिये अन्यों का मुँह भी जोहते हैं।बड़ी ताकतों की दृष्टि को पहचानने की आव्यकता तो सदैव रहेगी ही।उनकी रणनीति कब बदले सिद्धान्तो और स्वार्थ के वशीभूत हो जाय कहना कठिन है अतः फूँक फूँक कर पाँव तो रखने ही पड़ते हैं।पाकिस्तान की बढ्ी हुई हिम्मत के पीछं यह भी एक कारण प्रतीत होता है।उसे देखने क यह दूसरा दृष्टिकोण है जिसके तहत उसने सेना को मनमानी की छूट दे रखी हो और सेना आतंकवादियों के साथ मिलकर उनकी छद्म सहायता करती हो।समस्या के समाधान की दिशा मे ईरान की तरह ही खुली धमकी देने की आवश्यकता प्रतीत होती है।
पुनःमूल विषय पर लौटते हुए यह कहने की इच्छा होती है कि तत्काल अशांति के परिपोषक देश के अंदर ही हैं जिन्हे पहचानना कठिन हैऔर जो बार बार इंडियन करेंसी की सुविधा प्रदान करअराजक माहौल उत्पन्न करने में सहायक हैं।अगर यह मात्र आतंकवादी ,अलगाववादी हरकतें होतीं तो पुलवामा शोपियाँ जैसे क्षेत्रों में वे पकड़े क्यों नहीं जा सके। भाग खड़े होने में सहायक कौन होते है।क्या यह भी प्रश्न नहीं उठता।
किन्तु हर हाल में भारत अधीरता प्रदर्शित नहीं कर सकता।शक्ति प्रदर्शन की आवश्यकता तो हैपर राजनीतिक कूटनीति के साथ।कश्मीर के अन्दर धीरे धीरे समर्थन का माहौल बनाना,नयी पीढी को आतंकी खबरों से खबरदार करना ,उनके अपवित्र मंसूबे की जानकारी देना ,तथा युवाओं, बच्चों की,मनोवृतियों को अनुकूल करने की चेष्टा तो करनी ही चाहिए । किन्तु अब सरहद पर युद्ध जैसी निर्मित स्थितियों से निपटना भी प्रथम प्राथमिकता है।
यह तो देश की वह बड़ी समस्या है जिससे निपटे बिना केन्द्रीय प्रशासन को प्रशासन की सफलता का श्रेय भारतीय देना नहीं चाहते ,पर देश के अन्दर के सुधारवादी कार्यक्रम भी तो किसी न किसी समस्या से जुड़े हैं और जिनका निदान किए बिना बेहतर भारत की कल्पना हम नहीं कर सकते।समस्या सबों को शिक्षित करने की है,सबके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की चिन्ता करने की, नारियों को बराबरी का दर्जा देने एवं उनके सम्मान की रक्षा करने की , वर्ग और जातिभेद को नष्ट करने हेतु सामाजिक मानसिकता में बदलाव लाने की और सबसे पहले भ्रष्टाचार मिटाने की और अनेक वे सब जिन्हें मैं नहीं किन्तु आप जानते हैं ,के लिए भी श्रेय और अश्रेय का विधान करना आवश्यक है।

आशा सहाय —17 -5 –2017।

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