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सशक्त विपक्ष की आवश्यकता

Posted On: 10 Aug, 2017 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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बहुत दिनों से जनता की आकाँक्षा थी कि एक ऐसा दल केन्द्रीय सत्ता में आए जो स्वतंत्र होकर जनहित का कार्य कर सके, अपने बहुमत के बल पर। मिली-जुली सरकार की व्यवस्था का अन्त हो, क्योंकि वह सदैव परमुखापेक्षी होने के कारण विकास कार्यों को आगे बढ़ाने में कठिनाई का अनुभव करती है और अब जब ऐसा हुआ तो केन्द्रीय सत्ता ने बड़े ही महत्वपूर्ण निर्णय लिये। विकास कार्यों को बहुमुखी दिशाएँ दीं और लगा कि रुकी हुई विकास की धाराएँ देश में नया परिवर्तन लाने को प्रावाहित होने लगी हैं।


Parliament House


जनआकाँक्षाओं के अनुकूल बनने और अपनी विचारधाराओं को शीघ्रातिशीघ्र जनता तक पहुँचाने में विरोधी पार्टियों की बाधाओं का सामना पड़ा। कभी-कभी हावी होते हुए सहयोगी दलों के कार्यकलापों का दुष्परिणाम आलोचनाओं के माध्यम से भुगतना पड़ा, पर विजय रथ बढ़ता ही गया। विजय अहंकार को जन्म देती है। संकल्पों के साथ विनम्रता सफलता का मार्ग अवश्य प्रशस्त करती है, किन्तु अहंकार का प्रवेश भी गलत कार्यों की ओर प्रेरित कर सकता है। अतः सदैव एक लगाम की आवश्यकता होती है।


अभी भारतीय मानचित्र पर अधिकांश राज्यों को भगवा रंग मे देखकर मन कुछ चौंक सा गया है। कोई बहुत खुशी इसलिए नहीं हुई कि भारत जैसे विशाल देश में यह कमजोर होते विपक्ष को संकेतित करता है। एक लोकतंत्र में दलविशेष का एकक्षत्र साम्राज्य हो जाना खतरे की घंटी हो सकती है। तब लोकतंत्र शासन की दूसरी अवांछित पद्धतियों की ओर भी अग्रसर हो सत्तासीन दल को मनमानी की छूट भी दे सकता है। हालाँकि वर्तमान सत्ताधारी दल से हम ऐसी अपेक्षा करना नहीं चाहते पर भारत जैसे विशाल देश में शासन का सुचारु रूप से चलना, किसी भी समुदाय के हितों की अनदेखी न होना, बलात कोई अस्वीकार्य कानून का न थोपा जाना, इस बात पर निर्भर करता है कि विभिन्न वे पार्टियाँ जो इनसे सम्बन्धित उद्देश्यों को लेकर उनका नेतृत्व करती हैं, उनको अपनी सशक्त आवाज लोकससभा और राज्य सभा में रखने का भरपूर अवसर मिले।


इस आवाज को प्राधान्य मिलना चाहिए, नक्कारखाने में तूती की आवाज के समान महत्वहीन इसे नहीं होनी चाहिए। अन्यथा देश के बहुत सारे वर्गों की बातें अनसुनी रह जाएँगी। लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष की भूमिका सर्व विदित है। विधि निर्माण में विधेयक पर तर्क सम्मत चर्चा में विपक्ष की भूमिका के महत्व से कोई अपरिचित नहीं है।


यह अत्यन्त दुर्भाग्य का विषय है कि विरोधी पार्टी के रूप में नायकत्व करने वाली वर्तमान पार्टी लम्बे समय तक सत्तासीन रहने के पश्चात अपने अन्तर्कलहों, गलत नीतियों, अन्दरूनी भ्रष्टाचार और गलत नेतृत्व के कारण प्रभावहीन होती जा रही हैं, जबकि उसकी सशक्त और सार्थक भूमिका की आवश्यकता है। यह हो सकता है कि वर्तमान सत्तासीन पार्टी अभी सही राह पर ही हो। किंचित भटकने पर उस पर अंकुश लगाने की कोशिश कभी कुछ राज्यों के द्वारा और कभी न्यायालय के द्वारा भी की जाती रही हो। पर शक्तिशाली विपक्ष के अभाव में संसद के दोनों सदनों में बहुमत प्राप्त, जिसकी संभावना है, सत्तासीन दल के हाथों सत्ता का दुरुपयोग भी हो सकता ही है। इतिहास इसका गवाह भी है।


लोकतंत्र में यह स्थिति अवांछित है। अतः विरोधी पार्टियों की एकजुटता की आवश्यकता है। जनता में भरोसा उत्पन्न कर उन्हें पहले की तरह अपनी छवि का निर्माण करने की आवश्यकता है। विरोधी पार्टियाँ जो अपनी भूमिका के प्रति सचेत भी हो रही हैं, भ्रष्टाचार युक्त दलों को साथ लेकर अपनी छवि बिगाड़ने ही की कोशिश कर रही हैं।


दलों के सिद्धान्तों में कमी ढूँढ़ना बहुत उचित नहीं लगता। पर सिद्धान्तों के कार्यान्वयन में ढिलाई होने के कारण भ्रष्ट आचरणों को प्रवेश मिल जाता है और जनता तक सिद्धांतों का व्यावहारिक लाभ नहीं पहुँच पाता। अतः मूल को ही सुधारने की आवश्यकता है। संगठनात्मक संरचना में बदलाव कर पार्टी को प्रभावी बनाया जा सकता है। द्विदलीय व्यवस्था का इस देश में अभाव है। विभिन्न क्षेत्रीय दल भी राष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रहे ही हैं। जानें कितने असंतुष्ट गुटों ने नये दलों का निर्माण किया ही है। इस व्यवस्था में कुछ लाभ तो है, पर हानियाँ भी कम नहीं। द्विदलीय व्यवस्था में सत्तासीन दल को न चाहने वाले को स्वयमेव दूसरा सशक्त दल मिल सकता है, पर भिन्न-भिन्न विपक्षी दलों के अस्तित्व के कारण मतभेद की संभावना अधिक होती है। आपस में मिलकर भी मतैक्य नहीं हो सकता।


अभी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों में क्रॉस वोटिंग की समस्या इसी अंदरूनी एकता के अभाव में उत्पन्न हुई। इस बहुदलीय व्यवस्था का एक बड़ा कारण तो भाषायी आधारों पर राज्यों का निर्माण भी है, जो अपनी जन आकाँक्षाओं के आधार पर पृथक राष्ट्रीय दलों की स्थापना करते हैं। किन्तु इतने बड़े देश के विभिन्न समुदायों की आकांक्षाओं और मानवीय अधिकारों को देखते हुए इनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। ऐसी स्थिति में मिले-जुले दलों की सशक्त भूमिका की आवश्यकता है, ताकि लोकतांत्रिक मानदंडों और संविधान की गरिमा की सुरक्षा हो सके।


वर्तमान सत्तासीन दल का सुशासन अगर सर्वप्रिय होगा, तो खतरे की कोई बात नहीं दिखती। अगर सुशासन में सत्तालोलुपता और स्वार्थ समाहित हो जाएगा, तो स्थिति स्वयमेव परिवर्तित हो जाएगी। हमने अभी इमरजेंसी अवधि को विस्मृत नहीं किया है। देश की जनता प्रौढ़ हो चुकी है और अवसर पाने पर मतों की ताकत दिखा सकती है।


लोगों को भय है कि संघ परिवार के गुप्त एजेंडे वर्तमान सत्तासीन दल पर हावी हो सकते हैं। निवर्तमान उपराष्ट्रपति ने जाते-जाते मुस्लिम समुदाय की असुरक्षा जनित मन की चिन्ता व्यक्त की है। विपक्ष कहता है कि सत्तासीन दल के कार्यकलापों से डेमोक्रेसी समाप्त हो जाएगी। पर ऐसा लगता है कि डेमोक्रेसी पर खतरा तब आएगा, जब विपक्ष अपनी सशक्त भूमिका भूल जाएगा। यह अच्छी बात है कि विपक्ष जागरूक हो रहा है। अपने बिखरावों तथा लचर क्रियाकलापों पर विराम देने की कोशिश अगर वह करता है, तो लोकतंत्र के लिए यह शुभ सूचना होगी। देश के लिए सशक्त विपक्ष की आवश्यकता है।

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