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अनैतिकता बच्चों और किशोरो में

Posted On: 15 Dec, 2017 Social Issues में

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अखबारआजकल गुजरात चुनावी दंगल की खबरों से भरा पड़ा है। टेलीवीजन के पर्दे पर वाग्वाणों से एक दूसरे को विद्ध करते महत्वपूर्ण शख्सियतों  की असलियतेंउभर कर सामने आरही है । पर यह तो मौसमी ज्वार है कुछ दिनों मे सिर्फ प्रभाव ही शेष रह जाएँगे।पर दे श के सामाजिक बंधनों ,सम्बन्धों को तार तार करनेवाली जो समस्या रह रह कर चौंका देती है , जिसका कोई स्थायी निदान नहीं मिलता वह है बच्चो और किशोरों में बढ़ते हुए अनैतिक व्यवहारों की समस्या। निश्चय ही इसके दो पक्ष हैं –बच्चों और किशोरों के द्वारा किए गये ऐसे व्यवहार और बच्चो और किशोरो के प्रति किए गयै अनैतिक व्यवहार।

ऐसा नहीं है कि यह समस्या कोई आज की है और सिर्फ भारतवर्ष की है। यह विश्वजनीन और आदिम स्थितियों से भी जुड़ी है।किन्तू आज यह विशेष रूप से उजागर होरही है क्यों कि जब सम्पूर्ण विश्व उत्तरोत्तर सभ्य होने का दावा कर रहा है तो असभ्यता काएक केन्द्र बिन्दु आखिर इस वर्ग के बालऔर किशोर क्यों बन रहेहैं खासकर भारत जैसे देश में जहाँ सामाजिक सम्बन्धों के ढाँचे को विशेष महत्व दिया जाता है उसकी स्वस्थ बुनावट को बनाए  रखने को हम सदैव  प्रयत्नशी ल हैं?  प्रयत्न किए जारहे हैं इन समस्याओं के तहों तक पहुँचनेऔर समाधान ढूँढ़ने की दिशा में।इसी लिएअखबारों में छपे और टी वी चैनलों मे प्रकाशित एक खबर ने अनायास ही ध्यान आकृष्ट कर लियाकि इन्फारमेशन और ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्टरीटी वी चैनलों को आदेश दिया है किवे सुबह छःबजे से रात दस बजे तक कोई कॉन्डोम ऐड प्रसारित न करें।आश्चर्य इस बात पर है कि इतनों दिनों से इस एड के द्वारा होने वाले दुष्प्रभावों की ओरसम्बद्ध मंत्रालय का ध्यान क्यों नहीं जा रहा था।

मात्र कॉन्डोम ऐड के प्रसारण ही नहीं,बहुत सारे ऐसे  प्रचार आते हैं जिनमें अतिरिक्त खुलेपन का सहारा लिया जाता है,वे कम घातक नहीं।टेलीविजन एक ऐसा मनोरंजन का साधन है जिसे देखने से कोई किसी को नहीं रोक सकता। इसने सम्पूर्ण विश्व को हर मायने में सबके करीब ला दिया है।सभी देखते हैं आबालवृद्ध।और इन प्रसारणों पर बच्चों की जिज्ञासा चरम पर रहती है।और इस जिज्ञासा का सही उत्तर परिवार जन अगर नहीं देते तो अन्य साधनों और स्रोतों से उसे जानने की कोशिश करते हैं।हमारे देश मेंअभी बच्चों की न वह परिपक्व मानसिक स्थिति है और न  समाज ही इतने अधिक खुलेपन का पक्षपाती हो सका है कि जीवन की साँगोपांग पारदर्शिता सबके सामने परोस सके।और वे अगर ऐसा करते हैं तोयुवावर्ग से लेकरप्रौढ़वर्ग तो तब भी उस दृष्टि से असरहीन होते हैंपर बाल और किशोर मन तत्सम्बन्धित उत्सुकता को दबा नहीं सकते जिसका परिणाम होता है बाल- यौन –अपराध, किशोर यौन –अपराध, जिसकी बढ़ती संख्या आज हमें बेतरह चौंकाने लगी है।

हम इसे अनैतिक करार देते हैं।पर यह एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है।बाल से किशोर वय में प्रवेश का संघिकालबहुत सारी विकृतियों को जन्मदेता है।किशोरावस्था की समस्याओं से हर जागरुक अभिभावक और नागरिक परिचित होता है।इस अवस्था की बड़ी सावधानी से निगरानी की आवश्यकता है।पाश्चात्य  शैली का पालन पोषण कहीं इनपर लगाम लगाना नहीं चाहतापर इन  सबको वह सेक्स एडुकेशन के जरिये स्पष्ट करने कीवकालत करता है।सारे मानवीय संबंधों में निहित इस भावना को मनोवैज्ञानिक ढंग से स्पष्ट कर जीवन शैली में इनके प्रति वर्जनाओं को विशेष सम्मान न देकर वे इसके नैतिक अनैतिक पक्ष का कम ही विश्लेषण करता है।भारतीय मर्यादाओं का उनके जीवन शैली मे विशेष स्थान नहीं होता।अतः टेलीविजन में दिखाए द़श्यों से,लैपटॉपऔर कम्प्यूटर जैसे ज्ञान माध्यमों सेजानकारी वे प्राप्त कर लेते हैंजिससे हुए उनकी मानसिक स्थिति पर असर को वे सामान्य और स्वाभाविक मानते हैं।हमारे समाज का एक वर्ग पाश्चात्य जीवन शैली की ओर झुकते झुकते इन विचारों को भी प्रश्रय देने लगा है। जीवन  शैली हमारी आधा तीतर और आधा बटे र होकर रह गयी है।क्योंकि भारतीय दृष्टिकोण अभी इस खुलेपन को पूर्णतः स्वीकार नहीं कर सका है।विशेषकर ग्रामीण परिवेश जहाँ अब भी भारत की अधिकाँ श जनसंख्या निवास करतीहै इस स्वच्छंदता को प्रकटतः स्वीकार नहीं करता।हम अभी भी मर्यादाओं मेजीते हैंअतः अपनी संस्कृति की रक्षा करने के लिए ऐसे प्रसारणों पर अवश्य ही रोक लगाने की आवश्यकता है।

बाल अपराधकी बढ़ती घटनाएँ चाहे वे यौन अपराध हों अथवा हत्या जैसे अपराध आज तेजी से बढ़रहे हैं।अभी हाल में एक खबर के अनुसार बच्चे ने इसलिए माँ और बहन की हत्या कर दी कि वे पढ़ाइ लिखाई के लिए उसपर अतिरिक्त दबाव डाल रहे थे।रेयान स्कूल के किशोर ने बच्चे की हत्या की कि वह घर में बहुत सारे दबावों को झेल रहा था और अपनी ताकत को सिद्ध करने के लिए,अपने मानसिकक विरोधों को स्पष्ट करने के लिए उसने ऐसे मार्ग की तलाश कर ली।कहा जा सकता है कि कि अभिभावक या माता पिता तो बच्चों की हर बात सुननी चाहिए। उसके मन में उठते प्रश्नों को समझकरउनके उत्तर तलाशे जाने चाहिए ।

ऐसी घटनाएँ सदैव होती आयी हैं और कुछ लोग यही मान कर इसेकुछ दिनों में विस्मृत भी कर देना चाहते हैं ।समाज सदैव इनका साक्षी रहा है।पर विद्यालयो, शैक्षिक संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों परऐसी घटनाओं का बढ़ते जाना बहुत चौंका देनेवाला है।अगर बच्चों को नैतिकता ,अनैतिकता के अन्तर की जानकारीनहीं दी गयी तो ये निरंतर बढ़ती ही जाएँगी।इस सम्बन्धमे परिवार और विद्यालयों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।बच्चों में जहाँ सुरक्षा की भावना पैदा करने की बहुत आवश्यकता है वहाँ बन्दिशों की भी जबर्दस्त भूमिका होती है। बच्चों केहाथों में अगर तमंचा पड़ जाए तो वे उसका प्रयोग कर के देख लेना चाहतेहैं। परिणामों की परवा उन्हें नहींहोती।घर के कोने में शराब या किसी प्रकार के नशे की चीजें देख लेते हैं तो उसके प्रयोग की ललक उनमें पैदा हो जाती है।इसी प्रकार आज बच्चों और किशोरों के हाथों में पड़े लैपटॉप  कम्प्यूटर आदि किसी चैनल ,यूट्यूब आदि के माध्यम से प्रसारित नग्न दृश्यों ,स्पष्ट या अस्पष्ट यौनाचार  को वे देखते हैं , मर्डर के तरह तरह के दृश्य उनके सामने आते रहते हैं उनके मनमें दबे आक्रोश को प्रगट करने कातरीका उन्हें मिल जाता है।    उत्सुकता उन्हें यौन क्राइम करने को विवश करती है। तब हत्या और ऐसे जघन्य अपराधों से बचने के लिएपहला कदम तो यह उठाना ही पड़ेगा कि ऐसी सामग्री अपरिपक्व बच्चों और किशोरों के आगे किसी तरह भी न परोसे जा सकें।साथ ही उन्हें अनुशासित रखने की भी उतनी ही आवश्यकता है ,जिसका अभाव आजकल सर्वत्र देखने को मिलता है।समाज में मर्यादितजीवन बिताने के लिएबाल्यपन से इन निषेधों, वर्जनाओं को पालन करने की आदत डालने की आवश्यकता है।इस बात को ध्यान में रखने की भी आवश्यकता है कि वे कहीं इनके कारण दब्बू न बन जाएँ।

दूसरा उपाय है उन्हें सही तरीके से यौन शिक्षा देने कीऔर उससे जुड़े नैतिक अनैतिक पक्षों को स्पष्ट करने की।हर जगह यह एक बढ़ता हुआ कदम है।

टी वी ने सारी वर्जनाओं को पार कर लिया है ।अपनी सामाजिक जिम्मेदारी वे पूरी तरह विस्मृत कर चुके हैं।टी वी के घर –घर प्रवेश के आरंभिक चरणों मेंवर्जनाओं का ध्यान उन्हें भी रखना होता था और  घर परिवार के लोग भीबच्चों के समय और दृश्य विषयों का चुनाव करते थे पर धीरे धीरे यह पकड़ ढीली पड़ती गयी।उसे सूचनाओं और ज्ञान का स्रोत मान छूटें दी जानी लगी और अब तो इतने सारे चैनलों की होड़ ने उन्हें हर सस्ती चीजें परोसने को बाध्य सा कर दिया है।

यही नहीं आज की मध्यवर्गीय जीवन शैलीऔर खान पान भी कम जिम्मेवार नहीं है।मांसाहार का अत्यधिक प्रचलन ,देखादेखी  मद्य का अत्यधिक सेवन भी कुछ कारक तत्व हैं। बड़ों की पार्टियाँ, उनमे किए जाने वाले उच्छृंखल व्यवहार, बच्चों को समयपूर्व बड़ा कर देते हैं।बचपन के खेलकूद उनसे छूटते जा रहे हैं।कहीं पुस्तकों के बोझ तले वे दबे हैं तो कहीं जिम्मेदारियों तले।खेलकूद के अभाव से अन्दर की उर्जा को निकलने का अवकाश नहीं मिलता। अन्तर्निहित ऊर्जा ऐसे कामों में दिशान्तरित हो जाती है।

आज विश्व का चिकित्सा विज्ञान किशोरों अथवा बड़ों द्वारा बाल यौन उत्पीड़न को ,शोषण अथवा यौनाचार को एक विशेष संज्ञा से अभिहित करता है।और, उसके लिए चिकित्सकीय समाधान भी ढूँढ़ता है।वे इसे पीडोफीलिया की संज्ञा देते हैं दवाईयां भी दी जाती हैं जो मानसिक विकलांगता से भी जुड़ी होती हैं।पर यह स्थिति मनोरोग प्रमाणित होने पर उत्पन्नहोती है। पर सामाजिक रूप से ऐसे कृत्यों का बहिष्कार ,दंडव्यवस्था , उसको घृणित करार देना भी कारगर उपाय हो सकते हैं।

किन्तु, अगर ये सारी समस्याएँ मनोरोग से जुड़ी हैं तो समय पर बच्चों किशोरों को चिकित्सकीय परामर्श देने का कार्य माँ बाप अथवा अभिभावक का होता है ।बढ़ते बच्चों की सख्त निगरानी भी अपेक्षित है।

वयस्कों द्वारा बच्चों का यौन शोषण के लिए उनकी मानसिक विकृति जिम्मेदार होती है।अगर यह लत है तो उसकी भी चिकित्सा की आवश्यकता है।समाज इस संदर्भ में भी अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हट सकता। हमारा समाज भारतीय आदर्शों से युक्त है।यहाँ सिर्फ पुरुष स्त्रियाँ, लड़के लड़कियाँ ही नहीं रहते । सम्बन्धों की डोर से बँधे वे पुत्र पुत्री, माँ बाप ,चाचा चाची, मामा मौसी भी होते हैं।ये सम्बन्ध अपनी गरिमा को बनाए रखने के लिए होते हैं।अपनी मर्यादा और गरिमा को छोड़कर अगर ये सम्बन्ध कुकृत्य पर उतारू हो जाते हैं तो समाज को उन्हें दंडित करना आवश्यक होता है।

कहना तो यह है कि सारी सामाजिक संस्थाएँ शैक्षिक संस्थाएँ और मीडिया को तत्सम्बन्थित जिम्मेदारी का एहसास होना चाहिये कि विशेषकर बच्चे किशोरों को इस मनोदशा मे न पड़ने दें । सम्हलकर ही दृश्यों को परोसें।   इस सम्बन्ध में पूर्णजागरूकता अपेक्षित है।

आशा सहाय।

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
December 16, 2017

प्रिय आदरणीय आशा जी अबकी बार प्रतिक्रिया जा रही है आपने बहुत अच्छा विषय उठाया है एस पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए बाल अपराध बढ़ते जा रहे हैं परिवार से अधिक उन पर समाज का असर पड़ रहा है आज का किशोर कहता है जीने दो उनके पास मौज के साधन ही साधन हैं

ashasahay के द्वारा
December 16, 2017

आदरणीया शोभा जी, बच्चों पर समाज की पकड़ तो छूटती ही जा रही है वे दिग्भ्रमित भी हो रहे हैं। मानसिक विकृतिया ँ बढ़ रही हैं। समाधान तो सोचना ही होगा।


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