चंद लहरें

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ashasahay


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हमें सेना की सफलता की कामना करनी चाहिए

Posted On: 12 Jul, 2017  
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social issues में

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भाषागत आधार और भावनात्मक एकता

Posted On: 27 Jun, 2017  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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ढूँढते समरस जहाँ(प्रश्न काव्य)

Posted On: 7 Jun, 2017  
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Social Issues में

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आवश्यकता – धैर्य और उदारता की।

Posted On: 29 May, 2017  
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Hindi Sahitya में

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समस्याएँ–अन्दर बाहर

Posted On: 17 May, 2017  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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भय बिन प्रीति नहीं

Posted On: 23 Apr, 2017  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

एक क प्रसिद्ध चित्रकार ने अपने एक प्रसिद्थ चित्र को चौराहे के एक खम्भे पर चिपका कर लोगों को उसमें खूबियां ढूढ़ने का निर्देश दिया था कुछ दिनों बाद उसने लक्ष्य किया कि चित्र के प्रत्येक भाग में खूबियाँ ही खूबियाँ दिखायी गयी थीं पुनःउसी चित्र की प्रतिकृति को वहीं चिपकाकर जब दोषों को चिह्नित करने का निर्देश दिया गया तो तो पूरे चित्र में दोष ही दोष दिखाए गये।यह लोगों की सामान्य मानसिकता है। सभी जाति वर्ग समुदायों में हमें गुण ढूढ़ने का प्रयत्न करना चाहिए,दोषों को नजरन्दाज करते हुए।आज की स्थिति में भी बुरे तत्वों को नजरन्दाज करते हुए अपनी दृष्टि को गुणान्वेषी बनानी चाहिए। आदरणीया मैम सादर नमस्कार बहुत सुन्दर ब्लॉग और यह दृष्टांत मुझे बहुत पसंद आया साभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

जय श्री राम आदरणीय आशा सहाय जी ,पहले सब विरोधी दल एक साथ आ गए थे लेकिन जैसे पकिस्तान ने कहा की कोइ स्ट्राइक नहीं हुई और सर्कार प्रधानमंत्री जी की लोकप्रियता बढ़ने लगी विरोधियो ने सबूत देने के साथ सरकार को कोसने लगे जरा टीवी में कांग्रेस जद (यू) प्रवक्ताओ के प्रित्क्रिया सुने शर्म आती सेना का अपमान करते सोचिये सेना और शहीदों के परिवार के साथ कैसी गुजर रही होगी ऍजब आतंकवादी हमले होते यही विरोधी दल मोदीजी को कोसते और कायर कहते थे इसलिए बताने में कोइ हर्ज़ नहीं इससे सेना का मान बढ़ता है वैसे चीन,रूस को छोड़ सबने समर्थन किया और देश की तारीफ हुई केजरीवाल,नितीश, और राहुल ऐसे नेता तो देश बी बेच दे कुर्सी के लिए.सुन्दर लेख.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

के द्वारा: ashasahay ashasahay

आदरणीया, सादर नमस्कार. हिंदुस्तान पाकिस्ताबन का विभाजन साम्प्रदायिक आधार पर. हुआ था. मोहमद अली जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के अनुसार हिन्दू और मुस्लिम दोनों अलग अलग कौम हैं, जो साथ साथ नहीं रह सकते. इसप्रकार धर्म निरपेक्ष भारत और साम्प्रदायिक पाकिस्तान का निर्माण हुआ. पाकिस्तान एक मुस्लिम राष्ट्र बना क्योंकि वह मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र था. इसी आधार पर पाकिस्तान नें कश्मीर को मस्लिम आहुल्य होने के कारण पाकिस्तान में मिलने के अनेक असफल प्रयत्न किये. यद्यपि की हर बार उसे हार का मुंह देखना पड़ा. बंगला देश में भी करारी हार के बाद से भी पाकिस्तान बौखलाया हुआ है. पाकिस्तान केनेता और कई आर्मी के जनरल भी कहते हुए सुने गए हैं की वे भारत का खून बहाएंगे. यही कारण है की पकिस्तान कभीकश्मीर की आज़ादी के नाम पर और कभी किसी और बहाने भारत में आतंकवाद फैलता है. मेरा विचार है जब तक पाकिस्तान जिहाद और दूसरे धर्मावलंबियों को काफिर कहने जैसे सिद्धांतों पर कायम रहेगा, कश्मीर का समाधान सम्भव नहींहै. गांधी, नेहरू, इंदिरा जी, मोरार जी, अटल बिहारी वाजपई जैसे नेताओंने पाकिस्तान से सम्बन्ध सुधारने की भरपूर कोशिश की. लेकिन असफलता ही हाथ लगी. हमें पाकिस्तान से हमेशा सावधान रहन पडेगा. . . काश्मीर की सुरक्षा का सम्यक प्रबंध करीना पडेगा. धन्यवाद

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

के द्वारा: achyutamkeshvam achyutamkeshvam

अत्यंत विस्तृत लेख है यह आपका आशा जी जिसमें अकाट्य तर्क भी हैं और ठोस तथ्य भी । लेकिन अंबेडकर के व्यक्तित्व की महानता पर उंगली उठाने वाला यही एकमात्र प्रश्न नहीं है जिसका उल्लेख आपने किया है । प्रश्न और भी हैं । इस समय सभी निहित स्वार्थों के वशीभूत होकर अंबेडकर के नाम की माला जप रहे हैं - राजनीतिक दल चुनाव में दलित वोटों की फसल काटने के लिए ऐसा कर रहे हैं तो आरक्षणवादी उनके नाम और तथाकथित संवैधानिक व्यवस्था की आड़ में आरक्षण को चिरकाल के लिए स्थायी कर देने के लिए । उनके नाम का दुरूपयोग तो आजकल सभी सीमाएं तोड़ रहा है । ऐसे में उनके व्यक्तित्व और कार्यों का वस्तुपरक और निष्पक्ष आकलन हो ही नहीं सकता । संविधान के निर्माण का सम्पूर्ण श्रेय केवल उन्हीं को देकर संविधान सभा के अन्य सभी सदस्यों के साथ परोक्ष रूप से अन्याय तो किया ही जा रहा है, इस तथ्य को भी अनदेखा किया जा रहा है कि स्वाधीनता-प्राप्ति के राष्ट्रीय आंदोलन में उन्होंने अत्यंत नकारात्मक भूमिका निभाई थी । संविधान की आवश्यकता और महत्व भारत के स्वतंत्र होने के कारण ही तो है । यदि देश परतंत्र ही बना रहता तो संविधान का भी हम क्या करते ?

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

आपका लेख भी पढ़ा आशा जी, उस पर विभिन्न टिप्पणियां भी पढ़ीं और उन टिप्पणियों के आपके द्वारा दिए गए उत्तर भी पढ़े । मैं आपके दृष्टिकोण से पूर्णरूपेण सहमत हूँ । जब देश परतंत्र था तो मातृभूमि को एक ऐसी स्त्री के रूप में चित्रित किया गया जो बेड़ियों में जकड़ी हुई थी । मन्तव्य था देशवासियों के मन में अपनी मातृभूमि को स्वाधीन करने की ऐसी इच्छाशक्ति जागृत करना जैसी कि किसी सुपुत्र के मन में अपनी माता को दासता के बंधनों से मुक्त करने के लिए होनी चाहिए । भारत माता की अवधारणा और उसका चित्र उसी से उद्भूत हुआ । अब समय परिवर्तित हो चुका है । अतः मातृभूमि के प्रति अपने प्रेम और श्रद्धा को प्रतीक-रूप में अभिव्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है तथा अन्य व्यक्तियों को उसी प्रकार की अभिव्यक्ति के लिए बाध्य करने करना वांछनीय नहीं है । अब तो मातृभूमि को व्यावहारिक रूप से कितना विकसित, समृद्ध एवं संसार हेतु आदरणीय बनाया जा सकता है, यह समझने एवं तदनुरूप आचरण करने की आवश्यकता है । अब समय देशवासियों के मध्य संघर्ष को टालने तथा समन्वय पर बल देने का है ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

आपका लेख काफी कुछ सोचने और समझने के लिए रखता है पर मेरे विचार में "भारत मत की जय" के साथ आने वाले लोग इस देश और इसके मिटटी के साथ सहज और सुन्दर रूप से अपने को पाते हैं और उसे स्वीकार करते हैं जब कि कुछ लोग जो कुछ और ही सोचते हैं और उसी मानसिकता से ग्रस्त हैं जिस कारण भारत के दो टुकड़े हुआ वो इसे स्वीकार नहीं करना चाहते और भारत के और टुकड़े करने पर इन तरीकों को अपना कर अपना मन और मत दे रहे हैं. जो इस देश को अपना देश ही नहीं समझता और इसके टुकड़े करने पर आमादा है उसमे कन्हिया जैसे युवा भी हैं जो वाम सोच कि उस राजनीति का अंग हैं जो केवल भारत को टुकड़े कर अपना उल्लू सीधा करना ही अपना धर्म मानते हैं. अब आप खुद ही सोचिये क्या ऐसे युवा जो भारत मात की जय कहने में अपनी शान नहीं समझते वो इस देश को कुछ भी दे सकेंगे ? सुभकामनाओं के साथ ...रवीन्द्र के कपूर

के द्वारा: Ravindra K Kapoor Ravindra K Kapoor

के द्वारा: vikaskumar vikaskumar

के द्वारा: pksingh123 pksingh123

के द्वारा: ashasahay ashasahay

हर युग की सभ्यता की परिभाषा भिन्न होतीहै। आज के युग के जिन्स और शोट्स पहऩे बच्चे सभ्य नही हैं यह कहना सरासर ज्यादती होगी । पश्चमी प्रभाव जिसे हम हर वक्त सूली पर लटका देते है हमे कभी भी मानव मूल्यों को छोडने को नही कहता. मानव-मूल्यों के वे भी हमारी भाॅती पक्छधर हैं। बात अगर संस्कृति की है तो बेशक हम अलग अलग संस्कृतियों के पोशक हैं। आपके विचार सोचने को बाध्य करते हैं कि क्या हम अपनी सभी गलतियों को पश्चमी प्रभाव कह कर दरकिनार कर सकतें हैं या कि हमे चाहिये कि हम अपने कुण्ठाऔ से निकल सही गलत का फैसला करना सीख लें । सिनेमा और टीवी महिला नेता किसी का दोष नहीं ज्ञितना अपने नजरिए का है।

के द्वारा:

हर युग की सभ्यता की परिभाषा भिन्न होतीहै। आज के युग के जिन्स और शोट्स पहऩे बच्चे सभ्य नही हैं यह कहना सरासर ज्यादती होगी । पश्चमी प्रभाव जिसे हम हर वक्त सूली पर लटका देते है हमे कभी भी मानव मूल्यों को छोडने को नही कहता. मानव-मूल्यों के वे भी हमारी भाॅती पक्छधर हैं। बात अगर संस्कृति की है तो बेशक हम     अलग अलग  संस्कृतियों के पोशक हैं। आपके विचार सोचने को बाध्य करते हैं कि क्या हम अपनी सभी गलतियों को  पश्चमी प्रभाव कह कर दरकिनार कर सकतें हैं या कि हमे चाहिये कि हम अपने कुण्ठाऔ से निकल सही गलत का फैसला करना सीख लें । सिनेमा और टीवी महिला नेता किसी का दोष नहीं ज्ञितना अपने नजरिए का है।

के द्वारा:

प्रिय आशाजी आपका लेख सबसे पहले मैने प्रतिक्रिया दी थी परन्तु जागरण मैं टेक्निकल फाल्ट था यह लेख क्या है ऐसालगा जैसे नेशनल ज्योग्राफी पढ़ रही हूँ क्या नहीं हैं आपके लेख मैं बिना गए अफ्रिका के एक हिस्से की मौसम से लेकर भूगोल पढ़ा दिया 'सौन्दर्य के भरपूर प्राकृतिक परिवेश में आँखें आश्चर्य से फैल-फैल जाती हैं।जिधर दृष्टि जाती है,हरियाली ही दिखाई देती है। पेड़-पौधे ,भाँति भाँति की वनस्पतियाँ अपने पूर्ण विकसित स्वरूप में दिखाई पड़ती हैं।जिन छोटे-छोटे सन्दर,आकर्षक फूल,पत्तियों,बूटों झाड़ियों को हम भारत में गमलों मे सजाकर उन्हें देखते नहीं अघाते ,वे यहाँ अपने पूर्ण विकसित स्वरूप में मानव के अस्तित्व की लघुता का एहसास कराने से नहीं चूकते' एक कवि की तरह आपने वहा की प्रकृति को देखा है मे यदि आपके लेखन के हर विषय को उठाऊ एक लेख बन जाएगा बेहद ,बेहतरीन लेख ऐसे ही लिखती रहें इस प्रतिक्रिया को विशाल प्रतिक्रिया समझियेगा डॉ शोभा

के द्वारा: Shobha Shobha

के द्वारा:




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